neha law student searching a call boy in chandigarh


वो यहाँ यानि नेहा मुम्बई मात्र चार-पांच दिन के लिये आई थी, मेरे सामने वाली आण्टी के यहाँ ठहरी थी। पहले दिन ही हमारी आँखें चार हो गई थी और आँखों ही आँखों में इशारे तक हो गये थे। मेरा दिल उसे देखते ही धड़क उठा था। वो बहुत सुन्दर पर एक सीधी सादी लड़की थी, बहुत ही शर्मीली सी, हमेशा सर झुका कर चलने वाली। पर उसकी तिरछी नजर बस घायल ही कर देती थी। वो अधिकतर सलवार कुर्ती ही पहनती थी।
मैंने शाम को ही उसके घर जाकर उससे दोस्ती कर ली थी। कुछ देर बात करने के बाद ही उसकी हिचक दूर हो गई थी। वो मुझसे सहजता से बात करने लगी थी। उसने मेरे दिल को अन्दर तक एक अनजानी कशिश से भर दिया था।
दूसरे दिन ही उसने मुझे बाजार से कुछ लाने को भी कहा था। मैंने इसे अपना सौभाग्य समझा और बाजार जाकर उसकी मंगाई हुई वस्तु उसे ला कर दे दी। तीसरे दिन उसे बाजार से कुछ किताबें लेने जाना था। उसने यह बात मुझसे कही। मैंने कहा कि मुझे किताबों के नाम लिख कर दे देना पर उसने कहा उसे खुद ही बाजार जाना होगा। बस उसे मेरी मदद की आवश्यकता थी।
मैंने कहा कि वो मेरे साथ साथ बाजार चले तो उसे सहूलियत होगी। वो मेरी बात सुन कर खुश हो गई। मैं उसके साथ बस अड्डे पर आ गया। बस में हमेशा की तरह बहुत भीड़ थी, पर वो तो झट से उसमें चढ़ गई। मैं भी लपक कर उसके साथ ही बस में उसके पीछे पीछे चढ़ गया। बहुत भीड़ थी, उसे भी कुछ तकलीफ़ हो रही थी पर मैंने उसे बता दिया था कि मैं उसके साथ साथ पीछे ही हूँ।
बस चल पड़ी … पास पास होने के कारण हमारे शरीर भी आपस में एक दूसरे से टकराने लगे। उसकी पीठ से मैं लगभग चिपका हुआ था। उसके शरीर की गर्मी मुझे मिलने लगी थी। वो भी धीरे धीरे अपनी पीठ को मेरे से चिपकाने लगी।
मुझे उसका इशारा मिलने लगा था। मेरे शरीर में सनसनी दौड़ गई। मैंने अपनी ओर से एक कोशिश भी की। मैंने अपने हाथ की कोहनी उसकी चूचियों के पास ले आया और हौले से उसे कोहनी से दबा दिया। उसने मेरी कोहनी को देखा और फिर मेरी ओर देखा। उसने मुस्कुरा कर नजरें झुका ली। अब तो मैं जान करके उसकी चूचियों को अपनी कोहनियों से दबाने लगा। मेरा शरीर गर्म होने लगा था, लण्ड भी सर उठाने लगाने था। वो भी अपनी कठोर होती हुई चूचियों को मेरी कोहनी पर दबाने लगी।
मैं धीरे से अपना हाथ नीचे ले जा कर उसकी गाण्ड के पास ले आया। उसकी गाण्ड के एक गोले को मैंने हल्के से दबा दिया।
आह्ह्ह ! कितने नर्म नर्म पर मांसल थे।
उसने मुझे फिर से देखा, उसकी आँखों में लालिमा आ गई थी। उसके पीछे खड़े हुए मैंने उसकी गाण्ड अच्छे से सहलाई। उसने धीरे से अपने पांव चौड़े कर लिये। यह साफ़ इशारा था कि उसे आनन्द आ रहा था और वो चाह रही थी कि मेरा हाथ अन्दर तक उसे सहलाये। उसकी गाण्ड की दरार खुल सी गई थी। मैंने उसका कुर्ता धीरे से उठाया और उसके दोनों गोलों के मध्य दरार में अपनी अंगुली घुमाने लगा।
उसने अपनी गाण्ड ढीली करके मेरी अंगुली को और भी गहराई में जाने का रास्ता दे दिया।
क्या मस्त गाण्ड थी उसकी ! ऐसा लगता था कि जैसे कोई दो बड़े आकार की गेंदें उस जगह फिट कर दी गई हों !
मेरी सांस वासना से फ़ूलने लगी। लण्ड खड़ा होता जा रहा था। मैंने उसकी गाण्ड के छेद में घुसाने के लिये अपनी अंगुली दबाई, उसने अपना हाथ धीरे से पीछे लाकर उसे हटा दिया। मैंने मौका हाथ से नहीं जाने दिया। मैंने अपना खड़ा लण्ड उसकी दरार पर अड़ा दिया और उस पर लण्ड को घिसने लगा।
अब मुझे नेहा की सांसें तेज होती सी लगी। वो उत्तेजित होने लगी थी।
मैं अपने लण्ड का दबाव बढ़ा कर उसे और गहराई में फ़ंसाने लगा। उसे भी मेरे लण्ड की मोटाई का अहसास होने लगा था। मैंने अपना एक हाथ धीरे से सलवार में घुसा कर उसकी चूत पर ले आया।
उसकी सलवार उस जगह से गीली हो चुकी थी। उसकी आँखें नशीली हो उठी थी। मैं उसकी चूत की दरार को खोजने लगा, उसकी चूत काफी फूली हुई लग रही थी। थोड़ी देर उसकी चूत पर हाथ फिराते हुए पता चला कि उसकी झांटें काफी बड़ी बड़ी हैं जिससे उसकी चूत की कटान ढूँढने में मुश्किल हो रही है।
थोड़ी मशक्कत के बाद आखिर मैंने उसकी दरार ढून्ढ ही ली और उसके दाने को पा लिया। मैंने उसकी चूत के दाने को छूकर उसे हिलाया। उसने एक आह भरी और मेरा हाथ हटा दिया।
तभी हमारा स्टेण्ड भी आ गया। हम बड़े बेमन से बस से नीचे उतर गये। नेहा की तो नजर ही नहीं उठ रही थी। मैंने ही बात करके उसे सामान्य किया।
हम दोनों ने मिलकर उसके लिये किताबें और कुछ गाईड्स ली, फिर हम एक रेस्तराँ में बैठ गये। केबिन होने के कारण मैंने नेहा के साथ कुछ अश्लील हरकतें भी की जो उसे बहुत ही अच्छी लगी।नीचे से हाथ डाल कर उसकी चूत भी दबाई, उसके बोबे भी दबाये, उसे चूमने की कोशिश भी की। नेहा ने भी शर्माते हुये अपनी चूत आनन्द से दबवाई। पर चुम्बन करने से उसे डर लग रहा था कि कहीं कोई आ ना जाये।
हम दोनों आईसक्रीम खाने के बाद बाहर आ गये और टेक्सी लेकर घर आ गये।
रात भर मेरी हालत बहुत खराब रही। कई बार मैंने नेहा के नाम से मुठ्ठ मारी।
दूसरे दिन लन्च के बाद नेहा का फोन आया। उसे मेरे से पढ़ाई के बारे में कुछ राय लेनी थी। लगभग दिन एक बजे मैं उसके यहाँ गया। वो बहुत ही कम कपड़ों में थी, सिमटी सी सोफ़े पर बैठी थी। मैं सादे पायजामे में था।
उसने एक किताब खोल कर मेरे सामने रख दी और मुझसे चिपक कर पूछने लगी कि इसका क्या मतलब है? पर मैं उसकी अदाओं से समझ गया था कि बात तो कुछ और ही है।
वो मुझसे चिपकी जा रही थी, उसके शरीर की गर्मी तक मुझे आ रही थी। यकायक उसने मुझे कमर से पकड़ लिया और मुझे धक्का दे कर लेटा दिया। उसने मुझे नीचे दबा लिया और मुझ पर झुक गई।
"राहुल, तुम बहुत अच्छे हो ! हाय कैसे रोकूँ अपने आप को?"
उसके नर्म-गर्म होंठ मेरे होंठों से चिपक गये। मैंने भी उसे कमर से जकड़ लिया। कुछ देर तक तो हम एक दूसरे को चूमते रहे फिर वो बैठ गई। इतनी देर में मेरा लण्ड सख्त हो गया था और बहुत ही कड़क हो कर तन गया था।
"कल बस में बहुत मजा आया था राहुल।"
"हाँ नेहा जी, आपकी गहराईयाँ नापने में बहुत आनन्द आया था।"
"ओह्ह मेरे राहुल, आओ मुझमें समा जाओ, मुझे निहाल कर दो। एक बार फिर से मेरी गहराईयाँ नाप दो ना। हाय रे तुम्हारा ये सख्त सा … ओह मुझे मार डालो राहुल।"
मैं कुछ कहता उसके पहले उसके नर्म हाथ मेरे सख्त लण्ड पर आ गये और मैं सिसक उठा। उसने पजामे के भीतर हाथ डाल दिया और मेरा लण्ड सहलाने लगी। मेरा लण्ड जो कि सख्त हो चुका था वो अब फुफकारें मारने लगा। वो मेरे लण्ड को दबा दबा कर आगे पीछे करने लगी। मैंने उसे लण्ड मसलने दिया, आनन्द जो आ रहा था ना।
मैंने भी उसकी कुर्ती के ऊपर से ही उसके बोबे दबाने शुरू किये। उसकी साँसें तेज होने लगी, उसकी आँखों में अजीब सा नशा छाने लगा जैसे वो आँखों ही आँखों में जैसे कह रही हो की नोच डालो इन कबूतरों को, मसल डालो इन्हें ! चोद डालो मुझे …
और मैंने जैसे उसकी इस भाषा को पढ़ लिया हो !
मुझ पर भी हवस सवार हो गई। पहले तो कुछ देर मैंने उसके बोबे कुर्ते के ऊपर से ही दबाए, फिर मैंने उसकी कुर्ती के अन्दर हाथ डाल दिया। उसकी चूचियाँ सख्त हो गई, चुचूक भी कड़े हो गये थे। उसके होंठों को अपने होंठों से दबाते हुये मैंने उसकी दोनों चूचियाँ भींच ली।
उसे मैं सहलाता रहा, दबाता रहा, भींचता रहा।
फिर मेरे हाथ धीरे धीरे उसकी चूत की तरफ बढ़ने लगे, मैंने उसकी चूत को चड्डी के ऊपर से ही सहलाना शुरू किया।
उसने जाली वाली चड्डी पहन रखी थी जिससे उसकी झांटों की चुभन मेरे हाथ पर महसूस हो रही थी, कैसे कांटों की तरह लग कर आनन्द दे रही थी उसकी झांटें।
पर मुझे चिकनी शेव की हुई चूत बहुत भाती थी, मैंने उससे कहा- अरे नेहा ! यह क्या? तुमने तैयारी करके नहीं रखी?
तो वो बोली- मेरे सनम, यह काम मैंने तुम्हारे लिए छोड़ा है। खुद कोई काम करने से और किसी से करवाने में बड़ा फर्क है। किसी ओर से करवाने में बड़ा मजा आता है।
फिर मैं उसे बाथरूम में ले गया और उसके अंकल की शेविंग किट में से मैंने शेविंग फोम निकला और नेहा की चूत पर मल दिया।
वो मेरी इस मालिश मात्र से ही गर्म हो रही थी और जमीन पर पैर रगड़ रही थी।
फोम लगाने के बाद मैंने रेजर निकाला और उसकी चूत पर फिराने लगा। धीरे धीरे और सावधानी से मैंने उसकी सारी काली काली झांटें साफ़ कर दी।
फिर मैं उसे उठा कर वापस सोफे पर ले आया।
मैं उसके सिर के पास खड़ा था और अब मैं उसकी चूत सहला रहा था और वो गर्म हो रही थी, वो आह आह कर रही थी।
उसकी लिसलिसी गीली चूत ! मैं उसे पहले तो सहलाता रहा, फिर वो बोली- मेरे दाने को सहलाओ ना !
मैं उसके दाने को सहलाने लगा, वो मेरा लण्ड पकड़ के सहलाने लगी और आगे पीछे करने लगी, वो लण्ड को अपने मुँह के पास खींचने लगी।
अब मैंने भी अपने को इस अवस्था में किया कि मेरा लण्ड उसके मुँह में चला जाये और मैं उसकी चूत पर जीभ फिराने लगा।
वाह क्या खुशबूदार चूत थी, मैं तो जैसे मदहोश होने लगा था और मेरा लण्ड उसके मुँह में लपलपा कर घुस गया।
उसकी कोरी चूत की भीनी भीनी खुशबू मेरे दिल ओ दिमाग में हलचल मचाने लगी थी।
मैं उसकी चूत की फांकों को फैलाकर लपालप चाट रहा था। मैंने उसकी चूत को चाट चाट कर लाल कर दिया। मैं उसके दाने को अपने होठों में भींच कर खींच रहा था और चूस रहा था। उसकी गाण्ड का छेद मस्त हो कर अन्दर बाहर आ जा रहा था। जैसे उसे भी लण्ड भी चाहिये था।
वो भी मस्ती में मेरा लण्ड जीभ से पकड़ कर चाटे जा रही थी। मैंने अपना लण्ड उसके हलक तक पेल रखा था। वो तो बस उम् उम् किये जा रही थी। फिर मैंने चूत को चाटना छोड़ के उसे फिर से सहलाना शुरू किया और दाने को रगड़ने लगा। और वो भी मेरा लण्ड मुँह से निकल के हाथ में लेकर मुठियाने लगी।
दाने को सहलाते ही वो आनन्द में डूब सी गई। तभी उसके हाथ के मुठ्ठ मारने से मेरा वीर्य जोर से निकल पड़ा। तभी वो भी बल खा गई और उसका पानी भी झड़ने लगा। वो मुझसे बुरी तरह से चिपक गई। फिर उसने शान्त होने पर ही मुझे छोड़ा।
कुछ ही देर के बाद उसने मेरा लण्ड फिर से खूब जोर जोर से चूसा। मेरा लण्ड एक बार फिर से तन्ना गया। मैंने अपने लण्ड को उसकी चूत पर रग़ड़ दिया। वो बस चुदने ही वाली थी कि नेहा के कान जैसे खड़े हो गये।
"अरे अपने कपड़े जल्दी से पहनो, जल्दी करो !!!" वो हड़बड़ा सी गई।
नेहा ने जल्दी से अपनी सलवार चढ़ा ली। मैंने भी जल्दी से कपड़े पहन लिये और आमने सामने बैठ गये, कोल्ड ड्रिंक की बोतल खोल ली और धीरे धीरे चुस्कियाँ लेने लगे।
तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया।
"आन्टी हैं, जल्दी आ गई आज तो?" वो अपना मुँह बनाते हुये बोली।
नेहा ने दरवाजा खोला। मुझे देख कर उसकी आन्टी मुस्कराई। मैंने उनका शिष्टाचारवश आगे बढ़ कर उनके पांव छुये। उन्हें इस प्रकार आदर देने से उनका शंकित मन एकदम से जैसे साफ़ हो गया।
"कैसे आना हुआ राहुल?"
वो शाम को नेहा जी को जाना था ना तो पूछने आया था।
"उसकी तो कोई बात नहीं, हम उसे स्टेशन छोड़ देंगे, राहुल थेन्क्स् !"
"नहीं आन्टी, बस पड़ोसी होने के कारण कोई मदद चाहिये तो बता देना।" मैंने कोल्ड ड्रिंक समाप्त की और जाने के लिये खड़ा हो गया।
अच्छा नेहा जी ! मुझे समय समय पर फोन करते रहना। कुछ चाहिये तो कह देना, बाय !!!
नेहा ने मुस्करा कर मुझे चिढ़ाया। मैंने अपने कदम दरवाजे की ओर बढ़ा दिये।
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